ऋषिकेश से ग्वारीघाट तक

कहानी शुरू हुई थी २०१० मे अगर मुझे ठीक से याद है तो। शायद २०११ मे भी हो सकती है। अब मुझे याद नहीं।

खैर, तारीखे जरूरी नहीं, हम बेवजह तारीखों मे उलझ के रह जाते है। जबकि उससे ज्यादा जरूरी होता है वाकया, कब हुआ इससे क्या फरक पढता है? पढता है क्या?

मैंने अपनी पहली कहानी लिखी थी २०१० या २०११ में। फिर उसके बाद मैंने संपादन कार्य शुरू किया। किताबो की समीक्षा करनी शुरू की और लेखकों के साक्षात्कार किये। इसी दौरान काफी घूमा फिरा भी। इससे पहले की मे भूल जाऊ, मुझे लगा इन यादो को संजोय के रख लू तो शायद बेहतर हो। अतीत के बारे मे लिखना सरल होता है। सब कुछ हो चूका होता है। आधे लोग गुजर चुके होते हो, जिन्दा भी हो तो शायद वह पल उनके लिए इतने मायने न रखे इसलिए शायद उन्हें याद भी न हो। सबको लिखना थोड़ी न है! कौन इतनी बारीकी से चीजों को याद रखता है?

अतीत के बारे मे लिखने के और भी फायदे है। एक तो यह की पुरानी यादो को तोडना मरोड़ना और अपने ढंग से पेश करना आसान होता है। वर्तमान के बारे मे लिखो तो शायद सैकड़ो लोग आपको तंग करने लगे।

खेर, यह सब मेरा मकसद नहीं। मुझे लिखना अच्छा लगता है, इसलिए यह सब लिख रहा हू। शायद कुछ को नागवाजार गुजरे।

लिखने की दो शर्ते होती है। पहली की सब सच्चाई और बेबाकपन से लिखो। लिखने की पहली शर्त ही है ईमानदारी। अगर लेखक इस बात से डर गया की लोग उसके बारे में क्या सोचेंगे तो फिर गया काम से। ऐसे लोगो को नहीं लिखना चाहिए। दूसरी शर्त यह है की पहली शर्त को कभी न भूले।

मेरे पास बहुत ज्यादा संजीदा किस्से नहीं है सुनाने के लिए। न ही बहुत ज्यादा रोमांचक। रोमांच से डर लगता है मुझे। अपने किस्से घिसे पिसे टाइप के है। लेकिन कोशिश रहेगी की कहने का ढंग मजेदार हो।

आज सिर्फ प्रीफेस तक ही रुक जाते है। जैसा की कबीर ने कहा है, “धीरे धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होये।”

ज्यादा जल्दीबाज़ी में लिखा तो शायद में खुद ही ऊब जाऊ। साप्ताहिक रखेंगे इसको तो सही रहेगा।

ऋषिकेश से ग्वारीघाट सिर्क एक कहानी है। सभी पात्र काल्पनिकहै। कृपया इसको वास्तविकता से न जोड़े। अगर आप आसानी से आहात हो जाते है तो इस कहानी को न पढ़े।

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