ऋषिकेश से ग्वारीघाट तक

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करने को ज्यादा कुछ था नहीं तो मैं मलेशिया चला गया एक दोस्त के सहारे। वहां पीएचडी में मुझे दाखिला मिल गया था। मलेशिया में पढाई लिखाई ज्यादा नहीं करते लोग। ब्याज दरे काफी सस्ती होती है। लोन आसानी से मिल जाता है, इसलिए ज्यादातर बच्चे स्कूल से निकलते ही लोन लेकर के कारोबार शुरू कर देते है। चीनी और बाकि देशो से लोगो के दम पे ही रिसर्च चलती है यूनिवर्सिटीज में।

हालाँकि किन्ही कारणवश मेरी रिसर्च अधूरी रह गयी और में वापिस लौट आया फिर से अपने घर बिन मांगी पत्रिका के माफिक। बिना किसी प्लान के की आगे करना क्या है। लेकिन शायद पूरी दुनिया में घर ही एक ऐसी जगह है जहा आप कितनी भी नाकामियां, कितनी भी ठोकरे खाने के बावजूद वापिस आ सकते हो और आपको सूली पे नहीं टांगा जायेगा। खैर, मेरे माँ बाप ने ज्यादा कुछ कहा नहीं और मेरी जिंदगी बिना किसी तय मंजिल की ओर खिसकती मालगाड़ी सी चलती रही।

जिंदगी में कोई काम न होना भी एक अभिशाप है। मेरे पास करने के लिए तो कुछ था नहीं। सारा दिन बस बैठ कर खिड़की से बाहर ताकता रहता था। सामने एक सड़क थी, यदा कदा कोई गाडी चली जाती। गांव का माहौल। हालाँकि एक बात अच्छी थी की गांव वालो के लिए एक नालायक लड़का कोई बड़े अचम्भे वाली बात न थी। गांव में ज्यादातर सभी के लड़के नालायक थे।

अब करे तो क्या करे?

फिर एक दिन ख्याल आया की लिखना ही शुरू कर देता हु।

बचपन में काफी लिखा करता था। काफी लोगो ने सराहा भी था। स्कूल में मैगज़ीन एडिटर भी रह चुका था। काफी शौक था पढ़ने और लिखने का। लोगो को कहानिया किस्से मेरे पसंद आते थे। ना भी आते हो लेकिन कभी किसी ने ज्यादा आलोचना भी न की थी। लेकिन लिखना भी कोई सरल काम नहीं है। दुनिया का सबसे मुश्किल काम है। आज तक मैंने इतने काम किये लेकिन लिखना उन सबसे कठिन मालूम पढ़ा। शुरुआत तो आराम से हो जाती है, काफी जोश भी बना रहता है। लेकिन फिर कुछ दिन बाद मन भटक जाता है, लिखने का मन नहीं करता।

मैंने लघु कहानियो का एक संग्रह लिखा था कॉलेज के दिनों में। श्री शर्मा करके दरयागंज में एक एडिटर हुआ करते थे। बड़ी हिम्मत करके मैं अपनी पाण्डुलिपि (उस ज़माने में हाथ से लिखी थी, हिंदी की टाइपिंग तब आती नहीं थी और किसी से टाइप करवाने के लिए पैसे नहीं थे) उनके पास लेकर के गया। अंग्रेजी के एडिटर शायद थोड़े स्टाइलिश होते होंगे। हालाँकि बाद में जब में जब में एडिटिंग की दुनिया में रच बस गया तो समझ आया की अंग्रेजी जगत में भी अच्छे बुरे दोनों तरह के एडिटर्स हैं।

शर्मा जी ने एक सरसरी निगाह डाली और बोले शार्ट स्टोरीज कोई नहीं पढता बालक। फिर बगल की खिड़की का दरवाजा खोला जो मरियल से बाबा आदम के ज़माने की लोहे की चिटकनी के सहारे जैसे आजकल के लड़को की जीन्स होती है न- बड़ी मुश्किल से कमर पे टिकी हुई, जरा सा जोर लगा तो खिसक गयी समझो वैसा ही कुछ। उन्होंने खिड़की खोली और एक धार मारी बहार मुँह से। गुटखा खा के बैठे थे शर्मा जी हमारे।

मैंने सोचा थोड़ी और कोशिश करू।

“कुछ कविताएं भी लिखी है मैंने वैसे…”

“अबे मेरे बालक। पोएट्री तो जॉर्ज एलियट के साथ ही मर गयी। अब तू यहाँ किस ज़माने में जी रहा है। अगर चाहता है लोग तेरी कविताएं पढ़े तो पहले कहानियां छाप। बड़ा आया।”

“आप शायद टी. ऐस. एलियट की बात कर रहे हैं। जॉर्ज एलीट तो कहानियां लिखती थी। औरत थी वह।”

पर तब तक शर्मा जी का फ़ोन आ गया और उन्होंने मुझे हाथ के इशारे से बहार निकल जाने को कहा। हम निकल गए।

मेरी सिचुएशन थोड़ी यूनिक रही हैं। मेरी कहानियां कभी सिरे से नकारी नहीं गयी। काफी प्रेडिटर्स (एडिटर्स के लिए हम लेखकों की दुनिया में इनसाइड जोक है) से में मिला था। सबने यही कहा की थोड़ा और निखारो और फिर हमारे पास दुबारा आना। लेकिन में एक नंबर का आलसी आदमी हु। एक बार जो लिख दिया लिख दिया। कहानियां लिखना दाल या सब्जी बनाने जैसा है। एक बार कुकर पे चढ़ा दी और पक गयी तो बार बार उसमे सुधार नहीं किया जा सकता।

तो मेरे आश्चर्य की कल्पना कीजिए; जब एक दिन अचानक से एक ईमेल मेरे जीमेल इनबॉक्स में पॉप अप हुआ। मेरे पास एक एंड्रॉइड फोन था और पहली चीज जो सुबह उठ के में करता था वो था ईमेल चेक करना। क्या मालूम कब किसी संपादक का महत्वपूर्ण मेल आ जाये?

“आप और कहानियाँ भेज सकते हैं और अपनी एक पारा की जीवनी के साथ एक तस्वीर भी मेल कीजिये।” बस इतना ही लिखा था। फ़ोन द्वारा भेजी गयी मेल थी। मुझे बाहर ख़ुशी हुई। इतनी जल्दी वापिस कोई भी एडिटर जवाब देता नहीं था तो ख़ुशी तो स्वाभायिक थी।

आधे घंटे में, मैंने उसे सब कुछ ईमेल किया। मैंने इंटरनेट पर प्रकाशक की खोज की। ज्यादा कुछ मिला नहीं। कोई नया प्रकाशक था। उनके पास कोई वेबसाइट नहीं थी। उन्होंने हालाँकि बड़े बड़े लोगो के लिए काम करने का दावा जरूर किया था। वैसे, बड़े लोगो के यहाँ फाइलिंग क्लर्क के रूप में काम करना मुश्किल नहीं है, मैंने मन ही मन सोचा लेकिन मेरे पास बहुत कम विकल्प थे इसलिए मैंने यह देखने का फैसला किया कि क्या वह कोई पॉजिटिव जवाब दे सकता है। और मैंने भेज दी मेल।

मैं नई पीढ़ी के वैनिटी प्रकाशकों से बहुत आशंकित था, जिन्होंने भारत में फसल उगा दी थी, जो पैसे लेके कुछ भी छाप देते थे। लेकिन कोशिश करने में कोई बुराई नहीं थी।मुझे घंटे के भीतर एक ईमेल मिला।

“कृपया बिना कपड़ो की तस्वीर भेजें। इस चित्र ने काम नहीं किया। “
मैं एक उत्तर प्राप्त करने के लिए उत्साहित था और वह भी घंटे के भीतर। आमतौर पर, प्रकाशकों को वापस उत्तर देने में महीनों लग जाते हैं और वह भी रिजेक्शन के साथ। लेकिन यह लड़का बहुत तेज था। मैं इतना उत्साहित था कि मैंने पूरा मेल भी नहीं पढ़ा और उसे दूसरी तस्वीर भेज दी।

पांच मिनट बाद एक और पिंग।


“नहीं, नहीं, यह तस्वीर सही नहीं है। हमें नंगे शरीर की तस्वीर चाहिए। आशा है आप समझेंगे। ”
तब जाके मेरे धीमे प्रतिक्रियाशील मस्तिष्क ने महसूस किया कि यह कमीना मुझसे नग्न तस्वीर मांग रहा था। मैं कोई बहुत सुंदर नहीं हूँ, और छह पैक एब्स या ऐसा कोई गठीला शरीर भी नहीं है। शायद यह आदमी की मानसिकता विकृत थी। किसी भी तरह, मैंने वापस उत्तर देते हुए कहा कि नंगे शरीर की तस्वीर का क्या मतलब है। फिर से कुछ ही मिनटों में एक पिंग।
“नंगे का अर्थ है नग्न। बिना कपड़ो के।”

मैंने उसका जवाब नहीं दिया और थोड़ी देर के लिए उदास हो गया।

इस वर्चुअल वर्ल्ड की यौन उत्पीड़न की घटना की बाद काफी समय तक कुछ लिख नहीं पाया।

लेकिन लेखक की जिंदगी कोई भी जान भूझकर नहीं चुनता। आप लेखक बन भी नहीं सकते। आप लेखक पैदा होते है। गॉड गिफ्टेड टैलेंट होता है। मेरे बस में होता तो मैं तो कोई साइंटिस्ट या इंजीनियर बनना पसंद करता और चैन की जिंदगी जीता, खूब पैसा भी कमाता; लेकिन अब उपरवाले ने मेरे को यही बनाया तो अब इसमें मैं क्या करू?

कुछ समय बाद फिर से मैंने कुछ और छोटी कहानियाँ लिखीं। मैंने हजारों प्रतियोगिता में प्रवेश किया और मेरा इनबॉक्स हजारों अस्वीकृति की गयी कहानियों से भर गया।

मैं अब तक हर चीज में असफल रहा था। लगभग दो साल में तीसवां दशक तक पहुंचने पर, मेरे पास कोई नौकरी नहीं थी, सभी सरकारी नौकरी की परीक्षाओं में कई बार असफल हो चूका था। पीएचडी से बाहर हो गया था और मुझे क्या करना हैं, इसका कोई स्पष्ट विचार नहीं था। लानत है! मुझे यह भी पता नहीं था कि क्या मैं लिख कर सही काम कर रहा था या नहीं।

फिर मैंने अपनी उम्मीदों को कम कर दिया और ऑनलाइन ब्लॉगों को अपना काम प्रस्तुत किया। लेकिन फिर भी सफलता नहीं मिली। मानो हर कोई मुझे हराने के लिए बैठा था। काफी चिड़चिड़ा भी हो गया था में।

फिर मैंने भारतीय प्रकाशकों द्वारा चलाए जा रही प्रतियोगिताओं में भाग लिया। उन्होंने भी जवाब नहीं दिया।

खैर एक आखिरी कहानी लिखी और मन में ठान लिया था की अगर यह न छपी तो दुबारा कभी नहीं लिखूंगा। शायद ऊपरवाला सन्देश दे रहा हैं की मुझे लिखना चाहिए ही नहीं। ऐसा ही सोच के अपने मन को समझा लूंगा। एक महीना लगा और काफी मेहनत से मैंने एक कहानी लिख डाली और इस बार वह छप गयी। उपरवाले ने इशारा दे दिया था।

लोगो ने काफी सराहना की। पापा ने भी १००० रुपये दिए।

मेरी कहानी से पापा बहुत खुश नहीं थे। उन्होंने इसे पढ़ा था, मुझे इस पर यकीन था, लेकिन उन्होंने कई दिनों तक कोई टिप्पणी नहीं की।

इनाम के रूप में १००० का नोट जरूर दिया था और शायद यही समय था जब उन्होंने स्वेच्छा से मुझे कोई पैसा दिया। लेकिन हमने कहानी पर फिर से चर्चा की जब एक रिश्तेदार ने फोन किया और उसे पढ़ना चाहा।

“आप जानते हैं, पुराने स्कूल से हूँ, लेकिन मुझे वास्तव में लगता है कि व्यक्ति को उपयुक्त शब्दों का उपयोग करना चाहिए। आप कहानी में बकवास के बजाय नर्क या कुछ इसी तरह का इस्तेमाल कर सकते थे… ”

“लेकिन पापा, कोई नहीं कहता कि इन दिनों खूनी नरक है, बकवास आदर्श है और कहानी समकालीन है।”

बकवास का उपयोग न करें। और यहाँ मेरी पूरी ज़िन्दगी धीरे धीरे बकवास हो रही थी। मैं बिना बकवास करे कैसे लिख सकता था?

और वह चर्चा का अंत था। मैंने इसे तब से एक नियम कायम किया की कभी भी परिवार या रिश्तेदारों के साथ अपनी साहित्यिक खोज पर चर्चा न करे। आम लोगों के लिए लेखक और व्यक्ति को अलग करना बहुत मुश्किल है। दोनों को जोड़ कर देखने लगते है।

इसलिए शुरुआत में ही मैंने कहा की सिर्फ अतीत की बारे में लिखूंगा। वर्तमान के बारे में लिखू तो कोई न कोई तो पकड़ लगा की कितनी सच्चाई है।

कहानी छपने से एक अच्छी बात यह हुई की दिल्ली की एक एडिटर ने उसको पढ़ा और मुझे मिलने की लिए बुलाया। उनको एक मेरे जैसे पागल की ही जरूरत थी (ऐसा उन्होंने एक-दो साल गुजर जाने की बाद बताया)। अपने पास वैसे ही कोई नौकरी शौकरी थी नहीं। मुँह उठाया और चलने का निर्णय किया। अब उसके बाद क्या हुआ यह अगले अंक में बताऊंगा।

कबीर कहते है गरीबी में बहुत ताकत होती हैं।

” खड़ा रे कबीर पहने अपनी गरीबी,
सीना ठोके झाड़ता है अपनी फकीरी,
दुनिया कभी नहीं बोले सच्ची बोली रे,
बड़ी ताकत है गरीबी में,
मन लग गया मेरा गरीबी में।”

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