ऋषिकेश से ग्वारीघाट तक

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जब भी हमें उसकी सबसे ज्यादा जरूरत होती थी, तब चेतराम हमेशा नशे में मिलता था।

आपूर्ति किए गए सिंचाई जल को ढाला कहा जाता था। पूरा ब्लॉक नहरों से अच्छी तरह जुड़ा हुआ था। हमारा घर उस विशेष क्षेत्र में अंतिम था इसलिए हमने एक मिट्टी का टैंक बनाया था जिसमें हमने पानी एकत्र किया था। हमारे ब्लॉक के लिए गुरुवार को पानी छोड़ा जाता था और जब एक परिवार अपने खेतों की सिंचाई कर चूका होता था, तो वे पानी को पत्थरों, लकड़ी के चिप्स या जो कुछ भी आस पास पढ़ा हो, उस चीज का उपयोग करके अगले घर में भेज देते थे। इस प्रणाली ने बहुत उपद्रव पैदा किया क्योंकि लोग धोखा दे देते थे और पानी को अपने खेतों में तब भी मोड़ लेते थे जब उनकी बारी नहीं होती थी।

प्याज को पानी की बहुत आवश्यकता होती है। छोटी छोटी क्यारियां तैयार करने का पूरा उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि पानी छोटे बिस्तरों में एकत्रित हो जाए और प्रत्येक अंकुर पर्याप्त हो जाए। ढाला हमेशा रात में जारी किया जाता है। इसलिए पहले गुरुवार को रोपे लगाए जाने के बाद, हमने चेतराम की तलाश की जिसे हमने शर्मा जी के साथ नशे में धुत्त पाया।

“ओह दादी, क्षमा करें,” उन्होंने कहा, “मैं पूरी तरह से ढाला के बारे में भूल गया।”

“कोई बात नहीं,” पापा ने कहा। जब तक उन्होंने अचानक नौकरी छोड़ने का फैसला नहीं किया, तब तक पापा शराब पीने के आदि थे। शायद कुछ लोग उन्हें शराबी भी कहेंगे और व्यसन के मामले में काफी अनुभव के कारण, वह यह जानते थे कि एक शराबी से कैसे काम लेना है।

“मैं भी भूल गया,” शर्मा ने मुस्कुराते हुए कहा।

“क्या आप एक बार काम पूरा करने के बाद पानी को डायवर्ट कर सकते हैं,” पापा ने शर्मा को पूछा और उसने सिर हिलाते हुए कहा, “हाँ”।

चेतराम ने कई मौकों पर गिरने से बचने के लिए एक कुदाल के साथ नृत्य किया, लेकिन पूरे क्षेत्र को सिंचित करने में वह कामयाब रहा।

मैं आज तक नहीं समझ पाया की चेतराम २०० रुपये प्रतिदिन पर कैसे गुजरा कर पता था?

एक दिन में 200।

शायद अवचेतन रूप से, लेखन को आगे बढ़ाने के लिए यह मेरी प्रेरणा रही है। अगर वह २०० रुपये पर पूरी गृहस्थी चला सकता था तो फिर मैं क्यों नहीं?

चेतराम बीड़ी पर हर दिन १० रूपये और शराब पर ६५ रूपये खर्च लरता था।

बाकि बचे पैसो से ही घर चलता था।

और उसके पाँच बच्चे थे।

सड़क के बगल में हमारी कुछ जमीन धंस रही थी।

शर्मा एक सुबह हमे बताने लगा।

“मदरचोद लोग, ये ठेकेदार,” एक रिटेनिंग वॉल बनाने का वादा किया था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ और देखो ना अब आपकी मिट्टी मिट रही है। “

“हमें लगता है कि एक दीवार का निर्माण करना होगा,” पापा ने कहा।

शर्मा की आदत थी की वह गालियों का प्रयोग काफी उदारतापूर्वक करता था।

वास्तव में, सभी ग्रामीण बार-बार गालियां देने के आदि थे, लेकिन मेरे पिता के प्रति सम्मान के साथ (जो गांव में रहने वाले एकमात्र उच्च पद पर सेवानिवृत्त सरकारी अधिकारी थे) वे इससे बचते थे, लेकिन उनकी जीभ विशेष रूप से तब उत्तेजित होती थी जब वे उत्तेजित या भावुक होते थे।

“यह ग्राम सभा का काम है, लेकिन मादरचोद ने कुछ भी नहीं किया,” शर्मा ने अपना सिर हिलाते हुए और अपने नाखूनों को काटते हुए कहा।

एक रिटेनिंग वॉल पत्थरों से बनती है। ईंट की दीवार के बस की बात नहीं उत्तर भारत की बारिश को रोक पाए।

दीवार बनाने के लिए हमारे पास जुलाई तक का समय था। लेकिन पैसे नहीं थे। मेरे पास कोई पैसा नहीं था और पापा सेवानिवृत्त हो गए थे।

रुद्रपुर में जो मकान हमने किराए पर लिया था, उससे कुछ हजार मिल गए थे, लेकिन वह भी पर्याप्त नहीं था और इसलिए पापा ने किश्तों में दीवार बनाने का फैसला किया। हमने एक बंगाली पत्थर के राजमिस्त्री विशेषज्ञ संजय को काम पर रखा, जो ५०,००० रुपये में काम करने के लिए सहमत हुआ। ५०,००० में हमें 30 फीट की दीवार मिली जो कुल लंबाई की आधी थी।

संजय बांग्लादेश का एक अप्रवासी था जो बांग्लादेशी मुक्ति युद्ध के दौरान ढाका से आया था। वह अपने काम में बहुत अच्छा था और धीरे-धीरे दीवार ऊपर उठने लगी।

एक तरफ से पत्थर को तराशना पढता था जो काफी कठिन काम है। शेष पत्थरों को बिना आकार दिए बिना रखा गया था। पत्थरों की आपूर्ति एक स्थानीय डीलर द्वारा की गई थी, जिसने कहा कि उसके पास ऐसा करने के लिए एक परमिट है, लेकिन स्थानीय लोगों ने हमें बताया कि वह उन्हें अवैध रूप से पास की एक नदी से मिला था।

मेरी फ्रीलांस नौकरियों ने मुझे बहुत कम पैसा दिया था और मेरे माता-पिता वित्तीय मोर्चे पर मेरी मदद करने के लिए बहुत आगे नहीं आये थे।

मम्मी के पास ज्यादा नकदी नहीं थी वरना उन्होंने मेरी मदद जरूर की होती। पैसे नहीं, प्यार नहीं और करियर की संभावनाओं के साथ, मैं थोड़ा उदास महसूस कर रहा था।

मैंने लगभग हर पब्लिशिंग हाउस के दरवाजे खटखटाये थे लेकिन कोई भी मेरा लघु कहानी संग्रह प्रकाशित नहीं करना चाहता था।

किसी ने भी मुझे नौकरी तक के लिए उपयुक्त नहीं समझा क्योंकि मेरे पास पत्रकारिता या साहित्य की औपचारिक डिग्री नहीं थी।

लेकिन एक ऑनलाइन फ्रेंच मैगज़ीन थी जिसने न जाने कहा से मेरा पता लगाया- और छह महीने की अवधि के लिए मुझे अनुबंध पर रखने के लिए तैयार हुए। उन्हें हिंदी में भारत की कहानिया चाहिए थी घूमंतु टाइप की और छोटे शहरो की कहानिया। आखिरी स्वरुप क्या होगा यह उन्होंने मेरे ऊपर छोड़ा था।

अँधा क्या चाहे? दो आँखें।

बस उसी मैगज़ीन की आर्थिक मदद से में निकल पढ़ा भारत भ्रमण पे।

जब तक मैं किसी भी रूप में प्रकाशित हो रहा था, मैं खुश था।

उन्होंने मुझे रुपये का अग्रिम भुगतान किया जिससे मैंने कपड़ों की खरदियरी की और एक नया सेल फोन लिया।

सारी बातचीत फ़ोन पर हुई थी।

उस समय मेरी मानसिक स्तिथि इतनी ख़राब थी की मैं जो चाहे बक देता था। इतनी अच्छी शिक्षा मुझे प्राप्त हुई थी लेकिन पैसे में मूल्यांकन करे तो कोई सफलता मुझे नहीं मिली थी, तो फिर झुंझलाहट होना स्वाभाविक था।

लेकिन वह काफी अच्छे आदमी थे। मिश्रा नाम था। पता नहीं लोग इतने फॉर्मल क्यों हो चले थे? कोई भी अपना पहला नाम बताता नहीं था। शायद इसी से वह अपने को बड़ा आदमी समझते हो, पहले नाम से अगर आपको लोग जाने तो यक़ीनन आप बड़े आदमी है। सम्राट अशोक की जात भला कौन पूछता है? वह तो अशोक ही है।

“तो आप लेखन में कैसे घुसे?” मिश्रा जी ने मुझसे पूछा था।

“क्यूंकि जब में ७-८ बरस का था तबसे लेखक बनना चाहता था,” मैंने जवाब दिया था।

“वह तो जब में स्कूल में था तब में भी कवि बनना चाहता था, लेकिन बचपन के सपने पूरे थोड़ी न होते है, इसलिए पैसो के लिए में एडिटर बन गया।”

“अच्छा जी। “

“तो में आपको यह मौका क्यों दू पाण्डे जी?”

“क्यूंकि मैंने आपकी तरह अपने सपनों का गला नहीं घोटा, इसलिए।”

“हम्म्म।” उन्होंने लम्बी सांस छोड़ते हुए फ़रमाया था। खैर, इसके बाद दूसरे ही दिन मिश्रा जी ने मुझे कॉन्ट्रैक्ट ईमेल से भेज दिया था।

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