ऋषिकेश से ग्वारीघाट तक

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अगली सुबह, मैं दरियागंज स्थित लिटरेरी पब्लिशिंग हाउस देखने गया। कार्यालय बाहर से जीर्ण-शीर्ण था, लेकिन सभी दरियागंज में स्थित भवनों की तरह अंदर से नया था। मैंने दरवाजा खटखटाया लेकिन कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। हैंडल को चेक किया लेकिन वह बंद था। फिर, मैंने धकेलने की कोशिश की लेकिन फिर भी कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। कुछ देर बाद एक आदमी अंदर से उभरा और पूछा, “हाँ?”

“क्या आप सुहासिनी मैडम को बताएंगे कि मैं चटर्जी साहब से मिलने आया हूँ,” मैंने कहा।

सुहासिनी उस ऑफिस में सचिव थी और मेरे अब तक के उस कंपनी के साथ संपर्क का एकमात्र बिंदु। वह आदमी पाँच मिनट बाद एक गिलास पानी लेकर लौटा, जिसमें मैंने कुछ वोडका सरका दी। इन वर्षों में, मुझे एहसास हो गया था शराब मेरी जीभ को ढीला कर देती थी और प्रकाशकों के साथ व्यस्त बातचीत के लिए कुछ उदार संचार की आवश्यकता थी।

मुझे जल्द ही एक क्यूबिकल में ले जाया गया, जहां चटर्जी नाम का एक बड़ा आदमी बैठा था। इस तारीख तक, मुझे नहीं पता कि उसका पूरा नाम क्या है। मेरे लिए वह हमेशा चटर्जी था।

“आपका स्वागत है पांडे जी,” उन्होंने अपना हाथ बढ़ाते हुए कहा।

मैंने कहा, “आप कैसे हैं?” और खुद को बैठा लिया।

“मैं तुमसे मिलना चाहता था, इसका कारण यह है कि हम शायद ही कभी अच्छी तरह से लिखित पांडुलिपियां प्राप्त करते हैं। हमें बहुत शर्म आती है, लेकिन ज्यादातर बहुत बेकार और स्तरहीन कहानियाँ हमको भेजी जाती है। आपका लिखा हुआ बेहतर था, थोड़ा अलग था। मैंने यह महसूस करते हुए खुशी जताई कि उसने मेरी बकवास को अच्छी तरह से लिखा हुआ पाया।

इससे पहले कि मैं कुछ कह पाता, एक संतरे के रस का गिलास लिए एक चपरासी दिखाई दिया और चटर्जी ने अपने लिए कुछ हरी चाय का ऑर्डर दिया। सुहासिनी फिर से दिखाई दी और मुझे एहसास हुआ कि उसने मिनी स्कर्ट पहन रखी थी। भले ही वह सुंदर नहीं थी, लेकिन वह अपने साधारण रूप को प्रदर्शित करने में सफल रही और कुछ उदार श्रृंगार और आकर्षक पोशाक के संयोजन के साथ, अगर वह सुंदर नहीं थी, तो बेशक ग्लैमरस तो दिखती ही थी। चटर्जी ने उसे कुछ फ़ाइल लाने के लिए कहा और वह बहार चली गयी।

कुछ मिनट बाद सुहासिनी ने आकर फाइल सौंप दी और अपने डेस्क के पीछे गायब हो गई। चटर्जी ने दिलकश आवाज दी।

उन्होंने कहा, “आप पांडे को देख रहे हैं, भारतीय लेखन केवल खुद की खोज कर रहा है और हम इसके सबसे आगे रहना चाहते हैं,” उन्होंने शुरू किया। मेरी सहमति दे चूका हूँ।

“आजकल देखो कितने नए लेखक आ गए है, अग्रिम रूप में इतनी बड़ी राशि भी आजकल दी जाती है, भारतीय प्रकाशन में अभूतपूर्व दौर है यह।”

“लेकिन विक्रम सेठ को अपनी पुस्तक के लिए एक बहुत बड़ा हिस्सा नहीं मिला क्या?” मैंने पूछा।

“उम्म?” चटर्जी थोड़ा हैरान हुआ।

“ठीक है, आपको बात समझ नहीं आ रही है। आप समझे, मैं युवा लेखकों को बढ़ावा दे रहा हूं, यह लेखक है, उसका नाम क्या है, याद नहीं कर सकता, उम्म, वह बहुत अच्छा लिखता है और अब प्रसिद्ध है और इसलिए उसका लेखन केवल सुधरेगा, लेकिन मैं किसी ऐसे व्यक्ति की तलाश कर रहा हूं जिसे मैं हाथ पकड़ कर ऊपर तक पंहुचा सकता हूं,”उन्होंने कहा।

“कौन?” मैंने पूछा।

“उम्म, उसका नाम क्या है, मैंने उसे इन दिनों बहुत पढ़ा है,” उसने अपनी उंगलियों को चटकाते हुए कहा, ” रोहिंटन मिस्त्री”!

“हाँ, लेकिन उसका भाई सीरस मिस्त्री भी एक बहुत बेहतर लेखक है, लेकिन मुझे लगता है कि दुख की बात है, वह प्रसिद्ध नहीं है,” मैंने कहा।

“क्या उसका कोई भाई भी है?” चटर्जी आश्चर्यचकित था, “और क्या वह एक लेखक भी है?”

“हाँ और हाँ।”

चटर्जी ने अपनी चाय की चुस्की ली और मुझे गौर से देखा। वह थोड़ा चिड़चिड़ा लग रहा था। शायद, उन्होंने इस बातचीत को अपने दिमाग में पहले से विचार करके रख रखा था लेकिन हमारी बातचीत वैसी नहीं हो पा रही थी जैसा शायद उन्होंने कल्पना की हो।

“ठीक है, मैं आपके साहित्यिक स्वाद को जानना चाहूंगा, आप कौन कौन से समकालीन लेखकों को पढ़ते हैं? उसने पूछा।

“मुझे रोमेश गुनसेकेरा पसंद है। ”लेकिन चटर्जी अब और अधिक आश्चर्यचकित थे।

“उम्म,” उन्होंने कहा।

“आपने उनके बारे में भी नहीं सुना है, शयद?” मैंने मुस्कुराते हुए पूछा। मुझे मुस्कुराना नहीं चाहिए था।

उन्होंने कहा, “नहीं,”

अपनी कुर्सी पर वापस लेटते हुए अपनी बाहों को अपने सिर के ऊपर रखते हुए कहा, “अगर आप तीन महीने में अपनी पांडुलिपि जमा करते हैं, तो मैं इसे संपादक को भेज दूंगा और जो भी वह तय करेगा वह अंतिम होगा,” उन्होंने घोषणा की और लैपटॉप में अपना चेहरा दफन कर दिया।

“अलविदा,” मैंने कहा लेकिन चटर्जी ने कोई जवाब नहीं दिया। मैंने अपना सिर हिलाते हुए ऑफिस छोड़ दिया। मुझे कुछ दिन बाद जाके यह एहसास हुआ कि मैंने मीटिंग का कबाड़ा मचा दिया था और वह भी उस प्रकाशक के साथ जो शायद मुझे मेरा पहला ब्रेक दे सकता था।

यूथ हॉस्टल रूम में अकेले (जो मुझे अब महसूस होने लगा था कि यह थोड़ा महंगा है, इसके बदले डोरमेट्री बेड लेना चाहिए था), लेते लेते मुझे लगने लगा जीवन अब व्यर्थ है। लेकिन असफलता लेखक के जीवन का एक अभिन्न अंग है।

युथ हॉस्टल की डोर्मिटोरिएस बहुत छोटी होती है लेकिन मेरे जैसे परम फक्कड़ आदमी के लिए यह उपयुत्क होती थी। आज भी है। लेकिन उस समय में अपने को थोड़ा ऊँचा समझ रहा था (पहली बार किसी संपादक ने बुलाया था) इसलिए रूम बुक किया था।

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आधे घंटे के बाद, मैं बेहतर महसूस करने लगा और कुछ खाने के लिए बाहर कदम रखा। मैं निकटतम मार्किट जो की ठीक युथ हॉस्टल की बिल्डिंग के पीछे स्तिथ है, वहा गया और कुछ चाऊमीन और कोक का आदेश दिया और खाना शुरू कर दिया।

अमीर लोगों ने इकट्ठा होना शुरू कर दिया था और चिकन और मटन की आपूर्ति के लिए अनेक वेटर इधर उधर भाग रहे थे। यह वह लोग थे जो अपनी कारों से बाहर कदम नहीं रक्खते थे। वे टिंटेड खिड़कियों के अंदर अपनी कार से ही सब कुछ मंगाते थे, मछली की तरह दारू पीते थे और गायब हो जाते थे।

“हैलो,” एक आवाज आई, शायद कोई मुझे पुकार रहा था। कोई भी मुझे यहां नहीं जानता था इसलिए मैंने खाना जारी रखा।

“नमस्कार,” इस बार थोड़ा जोर से।

“उम्म, नमस्ते,” मैंने कहा। एक लड़की मुझे हाथ हिला रही थी।

“तुम मुझे नहीं पहचानते, क्या?” वह हँसी।

“नहीं।”

“पीए हो क्या?,” उसने कहा, “तुम बस मुझे कुछ घंटे पहले मिले थे।”

“सुहासिनी?” मैंने पूछा। और वास्तव में, यह वही थी। यह थोड़ा आश्चर्यजनक है कि कपड़े बदलने से व्यक्ति की पूरी पर्सनालिटी बदल सकती है। एक सलवार कमीज में, वह बिलकुल अलग दिख रही थी।

“हाँ। आप हमारे द्वारा प्रकाशित नहीं हो रहे हैं। आपने चटर्जी को डरा दिया, वह आपके जाने के बाद आपके बारे में बात करना बंद नहीं कर सकता, ” वह थोड़ा और हँसी।

“मुझे लगता है कि विफलता ठीक है, शायद मुझे एक लेखक के रूप में विकसित होने के लिए कुछ और समय चाहिए।”

“अरे चटर्जी जाये भाड़ में।” वह हस्ते हुए बोली।

“आप सबसे कम उम्र के थे, हमने कभी भी आपसे काम उम्र के लेखक को स्वीकार नहीं किया, उसे आपको एक उचित मौका देना चाहिए था लेकिन वह किसी ऐसे व्यक्ति की तलाश कर रहा है जो जानता है कि उसकी पुस्तक को कैसे बाजार में लाया जाए ताकि वह तुरंत बिक सके।। यदि आप मुझसे पूछें तो आपकी कहानियाँ शानदार है। ”

“हममम।”

“मैंने आपकी पांडुलिपि पढ़ी,” उसने कहा। अब तक, मेरा चाउमीन ख़त्म हो चुका था और सुहासिनी भी कुछ नहीं खा रही थी। मैं उसे अपनी अगली थाली के लिए मुझसे जुड़ने के लिए आमंत्रित करना चाहता था लेकिन मैं एक दोस्त से मिल रहा था और मेरे पास केवल ५०० रूपये बचे थे।

एक चाऊमीन प्लेट की कीमत ७० रूपये थी। मुझे कल तक वोडका के लिए पर्याप्त धन भी चाहिए था लेकिन इतने में मेरा काम बन जायेगा, ऐसा सोच कर मैंने उससे चाऊमीन की पेशकश की।

“नहीं थैंक्स।” उसने मन कर दिया।

“वैसे आमतौर पर हमें डरावने, कॉलेज रोमांस या सॉफ्ट पोर्न के बारे में आधे बेक्ड विचार मिलते हैं और वे ठीक से संपादित भी नहीं होते हैं।”

“हम्म्म,” मैंने अपना सिर हिलाया।

“मैं यही रहती हूँ, एक पीजी में। बस पढाई के साथ पार्ट टाइम काम कर रही हूं, दौलत राम से अंग्रेजी में होनोर्स, मैं भी किसी दिन लेखक बनना चाहती हूँ।”

कुछ देर और इधर उधर की बातें करने के बाद हम अपने-अपने रास्ते चले गए।

क्योंकि मेरे पास करने के लिए कुछ नहीं था, मैंने अपना कमरा यूथ हॉस्टल में अगले दिन खाली कर दिया और घर वापस जाने का फैसला किया। मैंने गड़बड़ सिंह से संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन वह मिल नहीं सका। उसने मुझे जो नंबर दिया, वह हमेशा बंद आता था। इसलिए मैं अकेला लौट आया। मेरे लौटने पर मुझे पता चला कि गड़बड़ सिंह मुझसे दो दिन पहले लौट चुका था।

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